डेढ़ साल बाद भी नहीं मिला मुआवजा, फिर मानवाधिकार आयोग पहुंचा प्रसूता पूनम मौत मामला
आयोग ने पीड़ित परिवार से पूछा- मुआवजा राशि मिली या नहीं

पीलीभीत
शहर से सटे ग्राम अलीगंज निवासी देवेंद्र ने उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग को पत्र भेजकर अपनी पत्नी पूनम की मौत के मामले में अब तक मुआवजा न मिलने की शिकायत की है। यह शिकायत आयोग की ओर से भेजे गए एक पत्र के जवाब में की गई, जिसमें पूछा गया था कि आयोग के आदेशानुसार निर्धारित मुआवजा राशि पीड़ित परिवार को मिली अथवा नहीं। देवेंद्र के जवाबी पत्र के बाद प्रसूता पूनम और उसके सात माह के गर्भस्थ शिशु की मौत का मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।
गौरतलब है कि 5 मई 2024 की रात सात माह की गर्भवती पूनम को इलाज के लिए जिला महिला अस्पताल लाया गया था। आरोप है कि बेहोशी की हालत में ई-रिक्शा पर पहुंची प्रसूता को अस्पताल में भर्ती तक नहीं किया गया और ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर ने बिना देखे ही कहीं और ले जाने की बात कह दी। आर्थिक तंगी के चलते पति देवेंद्र निजी अस्पताल में इलाज नहीं करा सका। पूरी रात प्रसूता घर पर ही बेहोश पड़ी रही और अगले दिन उसकी व गर्भ में पल रहे सात माह के शिशु की दर्दनाक मौत हो गई।
मामले में देवेंद्र ने मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। आयोग ने जिलाधिकारी से जांच रिपोर्ट तलब की, जिसमें अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ की गंभीर लापरवाही सामने आई। सुनवाई के दौरान आयोग के सदस्य बृजभूषण और आर.एल. मल्होत्रा ने जांच अधिकारियों व आरोपितों को लखनऊ तलब किया।
जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन सीएमएस डॉ. राजेश कुमार, सीनियर रेजिडेंट डॉ. हिना प्रकाश, जूनियर रेजिडेंट डॉ. वैशाली गुप्ता, स्टाफ नर्स दिव्या उप्रेती, स्टाफ नर्स राखी लाल और आउटसोर्सिंग वार्ड आया प्रज्ञा को दोषी मानते हुए पीड़ित परिवार को ढाई लाख रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए गए थे। आयोग ने प्रमुख सचिव स्वास्थ्य को भेजे पत्र में यह भी स्पष्ट किया था कि मुआवजा राशि दोषियों से वसूली जा सकती है।
हालांकि 10 जनवरी 2025 को जारी आदेश के बावजूद अब तक पीड़ित परिवार को मुआवजा नहीं मिल सका। आरोप है कि शासन स्तर पर केवल कागजी कार्रवाई होती रही और कई दोषियों को राहत देते हुए उन पर जुर्माने का भार तक नहीं डाला गया। बीते 29 अप्रैल 2026 को आयोग ने फिर पीड़ित देवेंद्र को पत्र भेजकर मुआवजा मिलने अथवा न मिलने की जानकारी मांगी, जिस पर देवेंद्र ने पूरा घटनाक्रम बताते हुए शीघ्र मुआवजा दिलाने की मांग की है।
पत्रकार पर दर्ज कराया गया था मुकदमा
घटना की रात पूरे मामले का वीडियो बनाकर अस्पताल प्रशासन की लापरवाही उजागर करने पर पत्रकार सुमित सक्सेना पर भी मुकदमा दर्ज कराया गया था। आरोप लगाया गया कि पत्रकार ने सरकारी कार्य में बाधा डाली, जबकि वह पीड़ित प्रसूता और उसके परिवार के हित में अस्पताल व्यवस्था की खामियां सामने ला रहे थे। मामला उस समय भी काफी चर्चा में रहा था। मामले में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने संज्ञान लेकर प्रदेश के गृह सचिव, जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक समेत अन्य जिम्मेदारों की फटकार लगाई थी। साथ ही गम्भीर टिप्पणी करते हुए पत्रकार पर दर्ज एफआईआर को प्रेस की स्वतंत्रता पर कुठाराघात बताया था।




