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कैंब्रिज यूनिवर्सिटी लंदन ने प्रकाशित किया पीलीभीत के छात्र सैफ का शोध पत्र

पर्यावरण शिक्षा पर शोध: किताबों तक सीमित पढ़ाई, जमीनी हकीकत से दूर छात्र

पीलीभीत.
भारत में पर्यावरण शिक्षा की स्थिति पर एक महत्वपूर्ण शोध ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग के शोधार्थी मोहम्मद सैफ कुरैशी ने अपने अध्ययन में पाया है कि देश में पर्यावरण शिक्षा अभी भी केवल सैद्धांतिक ज्ञान और रटने तक सीमित है, जिससे छात्र वास्तविक समस्याओं की जड़ तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। यह शोध “टीचिंग द पॉलिटिक्स ऑफ अर्थ: रीइमैजिनिंग एनवायरनमेंटल एजुकेशन फॉर प्लैनेटरी जस्टिस इन इंडिया” शीर्षक से ऑस्ट्रेलियन जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल एजुकेशन (2026) में प्रकाशित हुआ है, जिसे कैंब्रिज यूनिवर्सिटी, यूनाइटेड किंगडम द्वारा प्रकाशित किया गया है। शोधार्थी सैफ कुरैशी जनपद पीलीभीत के पूरनपुर क्षेत्र स्थित शेरपुर कलां निवासी कांग्रेस नेता रहे स्व. अकरम कुरैशी के पुत्र हैं।
अध्ययन के मुताबिक, स्कूलों में छात्रों को प्रदूषण, जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसे विषय पढ़ाए तो जाते हैं, लेकिन इन समस्याओं के पीछे के राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारणों पर चर्चा नहीं होती। नतीजन छात्र केवल परीक्षा पास करने तक सीमित रह जाते हैं और समाधान खोजने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती। शोध में दिल्ली-एनसीआर के एक स्कूल और झारखंड के एक सामुदायिक शिक्षण केंद्र का तुलनात्मक अध्ययन किया गया। इसमें पाया कि जहां स्कूलों में पढ़ाई किताबों और परीक्षा तक सीमित है, वहीं सामुदायिक मॉडल में बच्चे पर्यावरण को अपने जीवन, संसाधनों और अधिकारों से जोड़कर सीखते हैं, जिससे उनमें जागरूकता और सक्रिय भागीदारी अधिक होती है। शोध यह भी बताता है कि वर्तमान पाठ्यक्रम पर्यावरणीय मुद्दों को गैर-राजनीतिक रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे छात्र यह समझ ही नहीं पाते कि इन समस्याओं के पीछे शासन, नीतियों और उद्योगों की क्या भूमिका है।

शोध में सुझाव दिया गया है कि शिक्षा प्रणाली में स्थानीय समस्याओं, नीति विश्लेषण और प्रोजेक्ट आधारित अध्ययन को शामिल किया जाए, ताकि छात्र केवल जानकारी तक सीमित न रहकर समाधान का हिस्सा बन सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षा प्रणाली में बदलाव नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ी पर्यावरण संकट को समझने के बावजूद उसे बदलने में सक्षम नहीं होगी।

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