
उत्तर प्रदेश के एटा जनपद के मारहरा कस्बे में 75 वर्षीय चमन मियाँ थे। चमन मियाँ का पूरा जीवन शारदा सक्सेना परिवार में बीता। शारदा सक्सेना ने चमन मियाँ को दस वर्ष की उम्र से ही अपने पास रखा, उनकी परवरिश की और इस तरह चमन मियाँ सक्सेना परिवार के ही सदस्य बन गए। शारदा सक्सेना दुनिया को अलविदा कह गए तो उनके पुत्र डॉ. विमलचंद्र सक्सेना ने भी चमन मियाँ को वही अहमियत दी जो शारदा सक्सेना के सामने थी।
साल 2018 में डॉ. विमल सक्सेना का निधन हो गया, अब बारी शारदा सक्सेना के पोते डॉ. सुबोध सक्सेना की थी, सुबोध ने भी चमन मियाँ को परिवार के बुजुर्ग सदस्य के तौर पर सम्मान दिया। बीते रोज़ बुधवार को चमन मियाँ ने भी सक्सेना परिवार के घर में आखिरी सांस ली, वो दुनिया को अलविदा कह गए। सक्सेना परिवार का सबसे बुजुर्ग सदस्य उनसे विदा हो गया। मगर जो विदा हुआ अब उन्हें ‘उनके’ धर्मनुसार सुपुर्द-ए-खाक किया जाना था। सक्सेना परिवार ने तमाम आखिरी रस्मात भी अदा कीं। सक्सेना परिवार ने नम आंखों भीगी पलकों से चमन मियाँ को उनके धर्म अनुसार आखिरी सफर पर रवाना कर दिया।
ज़ुहर की नमाज़ के बाद चमन मियाँ के जनाजे की नमाज़ अदा की गई। इसमें सक्सेना परिवार के डॉ. सुबोध सक्सेना, अमित सक्सेना, सुमित सक्सेना के अलावा ‘दूसरे’ समुदाय के लोग भी शामिल रहे। नमाज़ के बाद सक्सेना परिवार के सदस्यों ने चमन मियाँ का जनाज़ा अपने काँधे पर रखकर क़ब्रस्तान पहुंचे। चमन मियाँ को सुपुर्द-ए-खाक किया गया। सक्सेना परिवार के डॉ. सुबोध सक्सेना ने चमन मियाँ के बड़े बेटे फर्ज़ निभाते हुए सबसे पहले कब्र में मिट्टी दी, जिसके बाद बाकी लोगों ने मिट्टी डाली। उनकी शव यात्रा में सैकड़ों की संख्या में हिंदू और मुस्लिम लोग मौजूद रहे।
चमन मियाँ जिस सक्सेना परिवार में 66 वर्षों तक रहे उस सक्सेना परिवार ने अपना पूरा फर्ज़ अदा कर दिया। यह फर्ज़ महज़ एक परिवार का नहीं था, बल्कि इंसानियत का तक़ाज़ा था। यह समाज है। सियासत इसे मिटाना चाहती है। वो समाज में एक दूसरे का डर दिखाना चाहती है, अलगाव की लकीरें खींचना चाहती है। लेकिन समाज में मौजूद सक्सेना जैसे परिवार इस देश को ‘चमन’ बनाए हुए हैं। @ upnewsnetwork




