जब जनसुनवाई में फरियादी की आवाज नहीं, उसकी खामोशी सुन ली पीलीभीत के डीएम ज्ञानेंद्र सिंह ने…
जिलाधिकारी का मानवीय कदम, संवेदनशील प्रशासन तस्वीर आई सामने

सुमित सक्सेना, पीलीभीत।
जनसुनवाई अक्सर शिकायतों, फाइलों और आदेशों तक सीमित मानी जाती है। लेकिन मंगलवार को उत्तर प्रदेश के जनपद पीलीभीत स्थित जिलाधिकारी कार्यालय में एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने प्रशासनिक संवेदनशीलता की अलग ही मिसाल पेश कर दी।
जनपद के ग्राम रूपपुर सैजना चक मुस्तकिल निवासी दुर्गाप्रसाद अपनी दो परेशानियां लेकर जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह के सामने पहुंचे। पहली शिकायत थी कि ऋण का पूरा भुगतान कर डिस्चार्ज स्लिप जमा करने के बावजूद खतौनी से ऋण की प्रविष्टि समाप्त नहीं की गई। दूसरी पीड़ा यह थी कि तहसील परिसर से उनकी साइकिल चोरी हो गई थी। लेकिन इन दोनों समस्याओं से पहले जिलाधिकारी की नजर उस परेशानी पर गई, जो फरियादी ने शब्दों में नहीं, बल्कि अपनी खामोशी से बयां कर दी।

दुर्गाप्रसाद सुनने में असमर्थ थे। बातचीत के दौरान जिलाधिकारी ने महसूस किया कि शिकायत सुनने से पहले इस व्यक्ति को सुनने लायक बनाना जरूरी है। उन्होंने तत्काल जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण अधिकारी को कलेक्ट्रेट बुलवाया और मौके पर ही दुर्गाप्रसाद को श्रवण यंत्र उपलब्ध कराया। जैसे ही यंत्र लगाया गया, दुर्गाप्रसाद के चेहरे पर उभरी मुस्कान किसी सरकारी आदेश से कहीं अधिक प्रभावशाली थी।

इसके बाद जिलाधिकारी ने उपजिलाधिकारी सदर को निर्देश दिए कि खतौनी से ऋण प्रविष्टि तत्काल समाप्त कराई जाए। साथ ही तहसील से चोरी हुई साइकिल के स्थान पर नई साइकिल उपलब्ध कराने के भी निर्देश दिए। प्रशासनिक व्यवस्था में आदेश देना आसान होता है, लेकिन किसी व्यक्ति की अनकही जरूरत को पहचानना एक संवेदनशील जनप्रशासक की पहचान होती है।
कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में कुछ मिनट का यह घटनाक्रम बताता है कि सुशासन केवल फाइलों के निस्तारण का नाम नहीं, बल्कि लोगों की पीड़ा को महसूस कर उसका समयबद्ध समाधान करने का नाम है। शायद यही वजह है कि कलेक्ट्रेट से दुर्गाप्रसाद केवल अपनी शिकायत का समाधान लेकर नहीं लौटे, बल्कि उन्हें यह भरोसा भी मिला कि शासन-प्रशासन तब सबसे प्रभावी होता है, जब उसमें संवेदनशीलता भी शामिल हो।



